कोविड-19 जन्य महामारी के कारण विश्व का ध्यान पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरूद्धार की ओर हाल के वर्ष में विशेष रूप से आकृष्ट हुआ है।
जैव विविधता का क्षय, जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण प्रदूषण-तीन प्रमुख समस्याओं के विषय में वैज्ञानिको के साथ-साथ, आम जनो द्वारा भी अब गंभीर चिन्तन किया जा रहा है। इन सभी पर्यावरणीय समस्याओं में जैव विविधता संरक्षण केन्द्र बिन्दु है, क्योंकि जैव विविधता में कमी मुख्यतः प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। अनेक प्रजातियों बहुत तेजी से हमारे परिवेश से विलुप्त होती जा रही है। लुप्त प्रजातियों को पुनः पृथ्वी पर लाना संभव नहीं हो पायेगा तथा पृथ्वी के विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रो की अपूरणीय क्षति होगी।
जैव विविधता संरक्षण में वृक्षों की भूमिका सर्वविदित है। बड़े वृक्ष प्राणवायु देने के साथ-साथ अनेक प्रजातियों को प्राकृतिक आवास एवं भोजन आदि प्रदान करते है। अतः इन वृक्षों का पारिस्थितिकी तंत्र (म्बवेलेजमउ) में विशेष महत्व है। वैसे वृक्ष जो आकार में बड़े हो, 50 वर्षों से अधिक पुराने हो,दुर्लभ प्रजाति के हो, सौदर्यपूर्ण तथा सांस्कृति महत्व के हो, उन्हें विरासत वृक्षों की श्रेणी में रख कर संरक्षित किया जाना आवश्यक है।
जैव विविधता का क्षय, जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण प्रदूषण-तीन प्रमुख समस्याओं के विषय में वैज्ञानिको के साथ-साथ, आम जनो द्वारा भी अब गंभीर चिन्तन किया जा रहा है। इन सभी पर्यावरणीय समस्याओं में जैव विविधता संरक्षण केन्द्र बिन्दु है, क्योंकि जैव विविधता में कमी मुख्यतः प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन का परिणाम है। अनेक प्रजातियों बहुत तेजी से हमारे परिवेश से विलुप्त होती जा रही है। लुप्त प्रजातियों को पुनः पृथ्वी पर लाना संभव नहीं हो पायेगा तथा पृथ्वी के विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रो की अपूरणीय क्षति होगी।
जैव विविधता संरक्षण में वृक्षों की भूमिका सर्वविदित है। बड़े वृक्ष प्राणवायु देने के साथ-साथ अनेक प्रजातियों को प्राकृतिक आवास एवं भोजन आदि प्रदान करते है। अतः इन वृक्षों का पारिस्थितिकी तंत्र (म्बवेलेजमउ) में विशेष महत्व है। वैसे वृक्ष जो आकार में बड़े हो, 50 वर्षों से अधिक पुराने हो,दुर्लभ प्रजाति के हो, सौदर्यपूर्ण तथा सांस्कृति महत्व के हो, उन्हें विरासत वृक्षों की श्रेणी में रख कर संरक्षित किया जाना आवश्यक है।
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